“अनकही”

न जाने आज क्यूँ सब बिखरसा गयाँ,
सवरना ही था पर तेरा खयाल छूँ गयाँ|

हर मंजर पर तेरा निशाँ वाक्किफ था,
रुबरु होना ही था, पर तूँ मुडता चला गयाँ|

कौनसा साहील और कौनसा पता है तेरा,
आसमान ही था, हर तारा तूँ दिखता गयाँ|

शर्मसार दिखता है हर चेहरा इन गलियोंमे,
इत्तेफाक ही था, तूँ सभी को दर्पण बाँटता गयाँ|

बदगुमान हूँ, तूँ एहसास है या फिर है जिंदगी
बेखबर ही था, हर साँसमे तूँ घुलता गयाँ|

-निलेश सकपाळ
-०१ जुलै २०१३